विष्णु, विष्णु, हे मधुसूदन, करुणा के सागर नाथ।
एक रूप से दो रूप धरते, रचना-पालन-संहार साथ॥
तुम ही जग को जन्म देते, तुम ही करते देखभाल।
अस्थिर और एकतरफा को तुम मिटाते, महिमा तुम्हारा॥
जब इस जग की रचना का, पावन समय पास में आया।
ब्रह्मा का रूप धरकर विष्णु, कमल आसन अपनाया॥
महत तत्व से ब्रह्माण्ड तक, सारा जग विस्तार किया।
चौदह लोक बसाकर तुमने, जीवन का संचार किया॥
देव, दानव और सभी जीव, तुम ही हो ।
ब्रह्मा रूप में अपने हाथों, सुंदर जगत बनाते॥
जल, धरती, आकाश और वायु, सबमें रूप तुम्हारा।
कण-कण में तुम बसे हुए हो, विष्णु नाम है प्यारा॥
रचना करके स्वयं विष्णु ने, पालन का रूप अपनाया।
हर प्राणी की रक्षा करके, जग में प्रेम जगाया॥
युग-युग में अवतार लिया, धरती का सब भार मिटाया।
भक्तों की हर पीड़ा हरकर, धर्म का दीप जलाया॥
मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन और परशुराम बनकर, प्रेम सिखाया॥
राम-कृष्ण, बुद्ध, कल्कि रूप में प्रकट होकर धर्म की स्थापना किया॥
जब इस जग का अंत निकट हो, शिव का रूप अपनाते।
भूत-प्रेत के संग में आकर, रौद्र रूप दिखलाते॥
त्रिशूल और डमरू लेकर, प्रलय का नृत्य रचाते।
सारी सृष्टि समेट स्वयं में, जल में जग को मिलाते॥
तुम ही जग को जन्म देने वाले, तुम ही इसे चलाने वाले।
तुम ही अंत समय में विष्णु, सबको पास बुलाते॥
यह सब खेल तुम्हारी माया, कोई समझ न पाता।
एक तुम्हीं हो दो रूप में, भक्त यही गुण गाता॥
शेषनाग की शय्या पर तुम, पीले वस्त्र सजाते।
शंख, चक्र, गदा और कमल, चारों हाथ उठाते॥
लक्ष्मीजी चरणों में बैठीं, प्रेम से सेवा करतीं।
देव सभी, विष्णु की महिमा कहते॥
तुम्हारे हृदय में लोक अनन्त, रोम-रोम ब्रह्माण्ड।
नाभि-कमल से ब्रह्मा निकले, लेकर वेदों का ज्ञान॥
ऐसे ही यह जीवन चक्र, चलता सदा निरन्तर।
विष्णु की इस पावन लीला का, आदि नहीं और अन्त नहीं॥
जो एक रूप वही अनेक है, यही विष्णु का ज्ञान।
ब्रह्मा, महेश और विष्णु में, एक ही शक्ति महान॥
जो रचता है वही पालता, वही अंत में साथ।
विष्णु नाम को जपते-जपते, कटते दुख दिन-रात॥
जब भी मन में डर भर जाए, विष्णु नाम पुकारें।
टूटे मन को प्रेम से जोड़ें, जीवन राह सँवारें॥
दीन-दुखी जो शरण में आए, उसको गले लगाते।
भक्तों की छोटी-सी विनती, पल में सुनने आते॥
विष्णु, विष्णु, हे मधुसूदन, करुणा के सागर नाथ।
एक रूप से तीन रूप धरते, रचना-पालन-संहार साथ॥
तुम ही जग को जन्म देते, तुम ही करते देखभाल।
अस्थिर और एकतरफा को तुम मिटाते, महिमा तुम्हारा॥
मिलकर गाएँ विष्णु की महिमा, गाएँ पावन गीत।
विष्णु चरण का अमृत पीकर, बढ़ती जाए प्रीत॥
विष्णु, विष्णु नाम पुकारें, मन में दीप जलाएँ।
तेरी शरण में आकर प्रभु हम, जीवन सफल बनाएँ॥
जब इस जग की रचना का, पावन समय पास में आया।
ब्रह्मा का रूप धरकर विष्णु, कमल आसन अपनाया॥
ब्रह्मा का रूप धरकर विष्णु, कमल आसन अपनाया॥
महत तत्व से ब्रह्माण्ड तक, सारा जग विस्तार किया।